Mahmud Ghaznavi was a messiah

महमूद गजनवी एक मसीहा था: एक नजरिया ये भी!

By Ritu Bhiva March 26, 2022 03:49 0 comments

महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi) का ज़हूर एक ऐसे समुद्री तूफ़ान की तरह था,  जो अपनी राह में मौजूद हर मौज को अपनी आगोश में ले लेती है,  वह ऐसा फतेह था,  जिसकी तलवार की आवाज़ कभी तुर्किस्तान से आती तो कभी भारत से आती,  उसके कभी न थकने वाले घोड़े कभी सिंध का पानी पी रहे होते तो कुछ ही लम्हो बाद गांगा की मौजों से अटखेलियां करते। वह उन मुसाफिरों में से था,  जिसने अपनी मंजिल तय नही की थी,  और हर मंजिल से आगे गुजर जाता रहा।  उसे फ़तेह का नशा था।  जीतना उसकी आदत थी।  वैसे तो वह इसी आदत की वजह से अपने परचम को खानाबदोश  की तरह लिए फिरता रहा और जीतता गया।  पर अल्लाह रब्बुल इज्जत ने उसे एक अज़ीम काम के लिए चुना था, और अल्लाह अपना काम ले कर रहता है।

भारत का पुराना इतिहास खगालने पर  यहाँ का सामाजिक ताना बाना पता लगता है। पश्चिम एशिया से एक फ़तेह कौम का भारत पर वर्चस्व हुआ,  तो उन्होंने अपनी रिहायश के लिए,  हरे भरे मैदान चुने और हारे हुए मूल निवासियों को जंगल दर्रों और खुश्क बंजर ज़मीनों पर बसने के लिए विवश किया गया।  चूँकि मूल भारतीयों की तुलना में आर्य कम थे,  इसलिए उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग का ज़बरदस्त कमाल दिखाते हुए,  मूलभारतीयों को काम के हिसाब से वर्गों में और जातियों में बाँट दिया।  और इस व्यवस्था को धर्म बता कर हमेशा के लिए इंसानो को गुलामी की न दिखने वाली जंजीरों में जकड़ लिया।  ब्राह्मणों (आर्य) के देवता की नज़र में,  मूल भारतीय एक शूद्र,  अछूत,  और पिछले जन्म का पाप भोगने वाले लोगों का समूह बन गया।  ब्राह्मणों के धर्म रूपी व्यवस्था की हिफाज़त के लिए एक समूह को क्षत्रिय कहा गया। वह क्षत्रिय ब्राह्मणों के आदेश को देवता का हुक्म मानते और इस तरह सदियों सदियों से लेकर आज तक वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था से शूद्र बाहर नही निकल सके।

जब महमूद गजनवी को राजा नन्दपाल की मौत की खबर मिली,  तब ग़ज़नवी की फौज नन्दना के किले को फ़तेह करने के लिए बेताब थी।   इधर तिर्लोचन पाल को राज़ा घोसित करके गद्दी सौंप दी गयी।  त्रिलोचन पाल को जब ग़ज़नवी के फौजों की पेश कदमी की खबर मिली तो उसने किले की हिफाज़त अपने बेटे भीम पाल को सौंप दी। भीम पाल की फ़ौज गज़नबी के आगे एक दिन भी न ठहर सकी।  उधर कश्मीर में तिरलोचन ने झेलम के शुमाल में एक फ़ौज को मुनज्जम किया जो एक सिकश्त खोरदा लश्कर साबित हुई।

रणवीर एक राजपूत सरदार का बेटा था,  जो भीम सिंह से साथ नन्दना के किले पर अपनी टुकड़ी की क़यादत कर रहा था।  रणवीर बहुत बहादुरी से लड़ा और यहाँ तक कि उसके जौहर देख कर गज़नबी मुतास्सिर हुए बिना न रह सका।  वह तब तक अकेला ग़ज़नवी के लश्कर को रोके रहा जब तक उसके पैरों में खड़े रहने की ताकत थी।  उसके बाद ज़मीन पर गिर कर बेहोश हो गया।  आँखे खोली तो गज़नबी के तबीब उसकी मरहम पट्टी कर रहे थे।  रणवीर ने गज़नबी के मुताल्लिक बड़ा डरावनी और वहशत की कहानियां सुनी थीं।  लेकिन यह जो हुस्ने सुलूक उसके साथ हो रहा था,  उसने कभी किसी हिन्दू राज़ा को युद्ध बंदियों के साथ करते नही देखा। उसे लगा कि शायद धर्म परिवर्तन करने के लिए बोला जायेगा।  तब तक अच्छा सुलूक होगा,  मना करने पर यह मुस्लिम फ़ौज उसे अज़ीयत देगी। उसने इस खदशे का इज़हार महमूद से कर ही दिया,  कि अगर तुम क़त्ल करना चाहते हो तो शौक से करो पर मै धर्म नही बदलूंगा।  उसके जवाब में ग़ज़नवी के होंठों पर बस एक शांत मुस्कराहट थी।  गज़नबी चला गया। रणवीर के जखम तेज़ी से भर रहे थे।  वह नन्दना के किले का कैदी था। पर न उसे बेड़ियां पहनाई गयी और न ही किसी कोठरी में बंद किया गया।

कुछ वक़्त गुजरने के साथ ही कैदियों की एक टुकड़ी को रिहा किया गया जिसमें रणबीर भी था।  रिहाई की शर्त बस एक हदफ़ था  कि वह अब कभी गज़नबी के मद्दे मुकाबिल नही आएंगे।  यह तिर्लोचन पाल के सैनिकों के लिए चमत्कार या हैरान करने वाली बात थी।  उन्हें यक़ीन करना मुश्किल था।  खैर रणवीर जब अपने घर पहुंचा, तो उसे उम्मीद थी कि उसकी इकलौती बहन सरला देवी उसका इस्तकबाल करेगी और भाई की आमद पर फुले नही समाएगी। पर घर पर दस्तक देने  बाद भी जब दरवाज़ा नही खुला तो उसे अहसास हुआ कि दरवाज़ा बाहर से बंद है।  उसे लगा बहन यहीं पड़ोस में होगी।  वह पड़ोस के चाचा के घर गया तो उसने जो सुना, उसे सुन कर वह वहशीपन की हद तक गमो गुस्से से भर गया।  उसकी बहन को मंदिर के महाजन के साथ कुछ फ़ौजी उठा कर ले गए।  चाचा बड़े फ़ख्र से बता रहा था,  कि रणवीर खुश किस्मत हो जो तुम्हारी बहन को महादेव की सेवा करने का मौका मिला है। लेकिन यह लफ्ज़ रणवीर को मुतास्सिर न  कर सके।  रणबीर चिल्लाया कि किसके आदेश से उठाया। चाचा बोले,  पुरोहित बता रहा था कि सोमनाथ से आदेश आया है कि हर गाँव से तीन लड़कियां देव दासी के तौर पर सेवा करने जाएंगी।  हमारे गाँव से भी सरला के साथ दो और लड़कियां ले जायी गयी हैं।  रणवीर खुद को असहाय महसूस कर रहा था।  कहीं से उम्मीद नज़र नही आ रही थी।  ज़हनी कैफियत यह थी कि गमो गुस्से से पागल हो गया था।  वह सोच रहा कि वह एक ऐसे राज़ा और उसका राज़ बचाने के लिए जान हथेली पर लिए फिर रहा था।  और जब वह जंग में था तो उसी राज़ा के सिपाही उसकी बहन को प्रोहित के आदेश पर उठा ले गए।  उसने सोचा कि राज़ा से फ़रयाद करेगा,  अपनी वफादारी का हवाला देगा,  नही तो एहतिजाज करेगा।  चाचा से उसने अपने जज़्बात का इजहार किया।  चाचा ने उसे समझाया कि अगर ऐसा किया तो धर्म विरोधी समझे जाओगे और इसका अंजाम मौत है।

उसे एक ही सूरत नज़र आ रही थी,  कि वह अपने दुश्मन ग़ज़नवी से अपनी बहन की इज़्ज़त की गुहार लगायेगा,  लेकिन फिर सोचने लगता कि ग़ज़नवी क्यू उसके लिए जंग करेगा,  उसे उसकी बहन की इज़्ज़त से क्या उज्र वह एक विदेशी है,  और उसका धर्म भी अलग है।  लेकिन रणवीर की अंतरात्मा से आवाज़ आती कि उसने तुझे अमान दी थी,  वह आबरू की हिफाज़त करेगा,  और बहन के लिए न सही पर एक औरत की अस्मिता पर सब कुछ दांव पर लगा देगा।  क्यूंकि वह एक मुसलमान है।  रणवीर घोड़े पर सवार हो उल्टा सरपट दौड़ गया।

इधर सोमनाथ में सालाना इज़लास चल रहा था।  इस सालाना इज़लास में सारे राज़ा और अधिकारी गुजरात के सोमनाथ में जमा होते।  जो लड़कियां देवदासी के तौर पर लायी जातीं उनकी पहले से डांस की ट्रेनिंग दी जाती।  जो लड़की पहले यहाँ  पर आती उस पर सोम नाथ के बड़े भगवान का हक़ माना जाता।  बाकी लड़कियां छोटे बड़े साधुओं की खिदमत करने को रहतीं और अपनी बारी का इंतज़ार करतीं।  उन सभी लड़कियों को कहा जाता कि साज़ श्रृंगार और नाज़ो अदा सीखें,  जिससे भगवान को रिझा सकें।  एक दिन ऐसा आता कि जितने वाली लड़की को कहा जाता कि आज उसे भगवान  ने भोग विलास के लिए बुलाया है।  उसके बाद वह लड़की कभी नज़र नही आती।  ऐसा माना जाता कि महादेव उस लड़की को अपने साथ ले गए और अब वह उनकी पटरानी बन चुकी है। यह बातें रणवीर को पता थीं,  उसकी सोच सोच कर जिस्मानी ताक़त भी पस्त हो गयी थी।  तो भी उसका घोडा अपनी रफ़्तार से दौड़ रहा था।  ग़ज़नवी से मिल कर उसने अपनी बीती बताई। एक गैरत मन्द कौम के बेटे को किसी औरत की आबरू से बड़ी और क्या चीज़ हो सकती थी।  वह हिंदुत्व या सनातन को नही जानता था।  उसे पता भी नही था कि यह कोई धर्म भी,  और जब परिचय ही नही था तो द्वेष का तो सवाल ही नही था।  हाँ उसके लिए बात सिर्फ इतनी थी कि एक बहादुर सिपाही की मज़लूम तनहा बहन को कुछ पाखंडी उठा ले गए हैं और सब उसका भाई उससे मदद की गुहार लगा रहा है।  वह गैरत मन्द सालार अपने दिल ही दिल में अहद कर लिया कि वह एक भाई की बहन को आज़ाद कराने के लिए अपने आखिरी सिपाही तक जंग करेगा।

ग़ज़नवी जिसके घोड़ो को हर वक़्त जीन पहने रहने की आदत हो चुकी थी,  और हर वक़्त दौड़ लगाने के लिए आतुर रहते,  वह जानते थे कि सालार की बेहतर जिंदगी आलीशान खेमो और महलों में नही बल्कि घोड़े की पीठ पर गुजरी है।  गज़नबी फ़ौज को सोमनाथ की तरह कूच का हुक्म दिया।  यह अफवाह थी कि सोमनाथ की तरफ देखने वाला जल कर भस्म हो जाता है और गज़नबी की मौत अब निश्चित है।  वह मंदिर क्या शहर में घुसने से पहले ही दिव्य शक्ति से तबाह हो जायेगा। अफवाह ही पाखंड का आधार होती है।  गज़नबी अब मंदिर परिसर में खड़ा था,  बड़े छोटे सब पुरोहित बंधे पड़े थे।  राजाओं और उनकी फ़ौज की लाशें पूरे शहर में फैली पड़ीं थीं, जिन्हें चील कौवे खा रहे थे,  और सोमनाथ का बुत टूट कर कुछ पत्थर नुमा टुकड़ों में तब्दील हो गया था।  दरअसल सबसे बड़ी मौत तो पाखंड रूपी डर की हुई थी। कमरों की तलाशी ली जा रही थी,  जिनमे हज़ारो हज़ार जवान लडकिया बुरी हालत में बंदी पायी गईं।  वह लड़कियां जो भगवान के पास चली जाती और कभी नही आती।  पूछने पर पता चला कि जब बड़े प्रोहित के शोषण से गर्भवती हो जातीं तो यह ढोंग करके कत्ल कर दी जाती।  इस बात को कभी नही खोलतीं क्यू कि धर्म का आडंबर इतना बड़ा था,  कि यह इलज़ाम लगाने पर हर कोई उन लड़कियों को ही पापी समझता।

महमूद ने जब अपनी आँखों से यह देखा तो हैरान परेशान,  और बेयकीनी हालात देख कर तमतमा उठा।  रणवीर जो कि अपनी बहन को पा कर बेहद खुश था,  उससे गज़नबी ने पुछा कि क्या देवदासियां सिर्फ यहीं हैं?  रणवीर ने बताया कि ऐसा हर प्रांत में एक मंदिर है।  उसके बाद गज़नबी जितना दौड़ सकता था दौड़ा और ब्राह्मणवादी जुल्म,  उनके बुत कदों को ढहाता चला गया।  पुरे भारत में न कोई उसकी रफ़्तार का सानी था,  और न कोई उसके हमले की ताब ला सकता था।  सोमनाथ को तोड़ कर अब वह यहाँ के लोगों की नज़र में खुद एक आडंबर बन चूका था।   दबे कुचले मज़लूम लोग उसे अवतार मान रहे थे।  गज़नबी ने जब यह देखा तो तौहीद की दावत दी।  वह जहाँ गया वहां प्रताड़ित समाज स्वेच्छा से मुसलमान हो उसके साथ होता गया।  उसकी फ़ौज में आधे से ज्यादा लगभग हिन्दू धर्म के लोग थे जो उसका समर्थन कर रहे थे।  उसकी तलवार ने आडंबर,  ज़ुल्म और पाखंड को फ़तेह किया, तो उसके किरदार ने दिलों को फ़तेह किया।  वह अपने जीते हुए इलाके का इक़तिदार मज़लूम कौम के प्रतिनिधि को देता गया और खुद कहीं नही ठहरा।  वह एक लुटेरा नही,  इज़्ज़ातो का अमीन था। वह जो  महमूद गज़नबी था।

लेखक:  रमेश चन्द्रा

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