Gandhi Ambedkar

गॉंधी व आंबेडकर में विवाद और गांधी से असहमति

By Ritu Bhiva February 23, 2022 05:42 0 comments

असल में गॉंधी और डॉ. आंबेडकर दो विपरीत ध्रुवों के व्यक्ति थे, बल्कि दो अलग-अलग परम्पराओं और विचारधराओं के व्यक्ति भी थे। गॉंधी की विचारधारा वैदिक परम्परा की है, जो वेदों से शुरू होकर शंकराचार्य,  दयानन्द और विवेकानन्द से होती हुई गॉंधी पर खत्म नहीं होती, अपितु हिन्दुत्ववाद तक विकास करती है। किन्तु, आंबेडकर की विचारधारा अवैदिक परम्परा की है, जो आजीवकों से शुरू होकर कबीर से होती हुई बहुजनवाद पर खत्म होती है। एक शास्त्र और शस्त्र को मानती है, और दूसरी शास्त्र के विरुद्ध विज्ञान पर जोर देती है। इन दो विपरीत विचारधाराओं का संघर्ष होना ही था। सो, इतिहास में गॉंधी- डॉ. आंबेडकर-संघर्ष भी उसी तरह दर्ज है, जिस तरह गॉंधी और खिलाफत। खिलाफत से गॉंधी का कोई धार्मिक सम्बन्ध नहीं था। किन्तु वह उनकी परम्परा से मेल खाता था। किन्तु सच यही है कि जब-जब गॉंधी ने रामराज्य और खिलाफत का समर्थन किया, तब-तब वह लोकतान्त्रिक नहीं थे।मेरा इरादा गॉंधी और डॉ.आंबेडकर की तुलना करना नहीं है। मगर मैं अपने पाठकों को गॉंधी की पृष्ठभूमि बताना जरूरी समझता हूं, क्योंकि इससे किसी की भी वैचारिकी को समझने में आसानी होती है। गॉंधी एक कुलीन और संपन्न परिवार में जन्मे थे। इसलिए उनकी किसी भी किस्म की न कोई सामाजिक समस्या थी और न आर्थिक। इसलिए उनके जीवन में समाज को बदलने का कोई आन्दोलन हम नहीं देखते हैं।
 
कहा जाता है कि दक्षिण अफ्रीका  में गॉंधी को गोरों द्वारा अपमानित होना पड़ा था। इसका कोई साक्ष्य गॉंधी-लेखन के सिवा कहीं नहीं मिलता। इस एक घटना के सिवा वह जीवन में कहीं भी सामाजिक अपमान के शिकार नहीं हुए। इसलिए भारत में ऐसे लोगों पर उनकी नजर कभी नहीं पड़ी, जो रोज हिन्दुओं द्वारा सुबह से शाम तक अपमानित होते थे। बाद में उन्होंने राजनीतिक स्वार्थ से हरिजन-सेवा के (वह दलितों को हरिजन ही कहते थे) बहुत से नाटक किए, हरिजन बस्ती में जाकर रहे, हरिजन अखबार निकाला, हरिजन सेवक संघ बनाया आदि  उसी तरह जैसे आज आरएसएस और भाजपा के नेता दलितों के घर जाते हैं, खाना खाते हैं, पर जब कोई सवर्ण और वह भी सनातनी द्विज, दलित के घर रहने या ठहरने का काम करता है, तो दलितो को उसकी असलियत पता चल जाती है।

 सरोजनी नायडू ने लार्ड लुइस को लिखा था, ‘आप कभी नहीं जान पायेंगे कि उस बूढ़े व्यक्ति (गॉंधी) को गरीबी में रखने के लिए कॉंग्रेस पार्टी कितना धन खर्च करती है।’ नायडू ने दिल्ली की मेहतर-बस्ती में गॉंधी के रहने के बारे में बताया था, ‘जब वह भंगी बस्ती में रहने के लिए गए, तो बड़ी मात्रा में कॉंग्रेस के सवर्ण कार्यकर्ताओं को गन्दे कपड़े पहनाकर हरिजनों के रूप में उनके साथ रहने के लिए भेजा गया था।’ प्रोफेसर श्यामलाल ने लिखा है कि मेहतर बस्ती में गॉंधी के रहने के लिए हिन्दू सेठों ने टैंटों के आलीशान कमरे बनाकर दिए थे, जिसमें शयन-कक्ष, मुलाकातियों के लिए बैठक, सेवकों का कमरा तथा रसोई भी थी। गॉंधी वहॉं जितने दिन रहे, उनके लिए दोनों वक्त का भोजन बिरला हाउस से आता था। इस नौटंकी का एकमात्र उद्देश्य मेहतर समुदाय को डॉ. आंबेडकर से अलग करने का प्रयास था, जिसमें वह इतने सफल हुए कि आज भी यह समुदाय डॉ.आंबेडकर से नहीं जुड़ सका, और दलित वर्ग में सबसे निचला वर्ग बना हुआ है।  
 

गॉंधी-आंबेडकर-विवाद


गॉंधी और डॉ. आंबेडकर का पहला आमना-सामना 1930-31 में गोलमेज सम्मेलन लन्दन में हुआ। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के लोगों को सत्ता सौंपने का फैसला कर लिया था। अंग्रेजों के इस फैसले से द्विज हिन्दू और मुसलमान बहुत खुश थे क्योंकि वे सत्ता के दो केन्द्र थे। सत्ता उन्हीं के हाथों में आनी थी। किन्तु, गैर-हिन्दू खासतौर से दलित जातियों के लोग इस फैसले से दुखी थे। इसके पीछे उनका यह डर था कि अंग्रेजों ने जो आजादी उन्हें दी है, उनके जाने के बाद जब हिन्दुओं के हाथों में सत्ता आएगी तो वे फिर से गुलाम बना दिए जायेंगे। कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में इस पर पूरा एक अध्याय लिखा है।
 
डॉ. आंबेडकर ने मॉंग की कि दलित वर्ग सत्ता का तीसरा केन्द्र है। इसलिए हिन्दू-मुसलमानों के साथ-साथ दलित वर्ग को भी सत्ता में भागीदारी मिलनी चाहिए। बस क्या था? गॉंधी के समर्थन में कॉंग्रेस के लोगों ने देश के सभी प्रान्तों से दलितों की ओर से ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर को इस आशय के तार भिजवाने शुरू कर दिए कि वे गॉंधी के साथ हैं डॉ. आंबेडकर के साथ नहीं। रातोंरात दलितों के नाम से सवर्णों की संस्थाएं बन गईं और उनकी ओर से अखबारों में डॉ.आंबेडकर के खिलाफ जहरीले बयान और लेख छपवाए जाने लगे। ऐसा ही एक लेख 1 नवम्बर 1931 के ‘दि बाम्बे क्रानिकल’ में पंजाब के ‘अछूत उद्धार मंडल’ के सचिव मोहन लाल ने लिखा कि डॉ.आंबेडकर स्वराज-विरोधी भूमिका निभा रहे हैं। "जय श्रीराम" बोलकर जिस तरह आज हिंसा की जा रही है उसी तरह की हिंसा उस दौर में "गॉंधी की जय" बोलकर दलितों के साथ की जा रही थी। 3 नवम्बर 1931 के ‘दि टाइम्स ऑफ इंडिया’ में खबर थी कि सार्वजनिक मार्ग से पालकी में अपनी धार्मिक पुस्तक ले जाते हुए अछूतों के एक दल पर खद्दरधारी लोगों ने महात्मा गॉंधी की जय बोलकर हमला कर दिया।

असल लड़ाई क्या थी? असल लड़ाई नेतृत्व की थी? इसका मतलब यह नहीं था कि डॉ. आंबेडकर गॉंधी का नेतृत्व छीनना चाहते थे, बल्कि यह था कि डॉ. आंबेडकर गॉंधी को दलितों का नेतृत्व नहीं करने देना चाहते थे। गॉंधी हिन्दुओं के नेता थे, पर वह दलितों, मुसलमानों, सिखों, आदिवासियों आदि पूरे देश का नेता बनना चाहते थे। यही काम आज आरएसएस और भाजपा का हाईकमान कर रहा है। हिन्दू नेता दलितों की मुक्ति का नेतृत्व नहीं करते, बल्कि दलितों को हिन्दू बनानें का नेतृत्व करते हैं, जो आज हम नरेंन्द्र मोदी के नेतृत्व में भी देख रहे हैं। गॉंधी हिन्दुत्व की राजनीति कर रहे थे। जैसे ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने दलित वर्गों के लिए पृथक राजनीतिक अधिकारों का निर्णय लिया, गॉंधी से बरदाश्त नहीं हुआ, और वह उसके विरुद्ध आमरण अनशन पर बैठ गए। आरोप लगाया कि इससे दलित वर्ग हिन्दू फोल्ड से बाहर हो जायेगा। गॉंधी की सारी चिन्ता यही थी कि दलितों को, हिन्दुत्व से अलग नहीं होने देना है। डॉ. आंबेडकर असहाय थे, वह अगर गॉंधी के पक्ष में समझौता नहीं करते, तो न केवल आंबेडकर-रूपी शम्बूक की गर्दन काटने के लिए कितने ही राम तलवारें लिए निकल आते, बल्कि दलितों का भी भारी नरसंहार होता। इसलिए, हिन्दू फोल्ड में रहकर आरक्षण पर सहमति बनी, जो आज तक चला आ रहा है। इसी का परिणाम है कि आज लोकसभा और विधानसभाओं के लिए सुरक्षित सीटें हैं, पर उन पर जीत सवर्णों के वोटों पर निर्भर करती है, क्योंकि दलित वर्ग अल्पसंख्यक है, और कोई भी दलित प्रत्याशी दलितों के वोट से नहीं जीत सकता। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जीते हुए दलित विधायक और सांसद को सवर्णों को ही खुश रखना पड़ता है। अगर वह जरा भी दलित चेतना से काम करता है, तो दो बातें एक साथ होंगी, एक, अगले चुनाव में उसे पार्टी टिकट नहीं देगी, और दो, सवर्ण उसे अपना वोट नहीं देंगे। डॉ. आंबेडकर ने गॉंधी के साथ हुए इस राजनीतिक समझौते को दलितों को उदारता से मारने की योजना का नाम दिया था। दलितों को उदारता से मारने की यह योजना आरएसएस और उसके राजनीतिक दल  को इतनी पसन्द आई कि जो काम गॉंधी अधूरा छोड़ गए थे, उसे ये दोनों मिलकर पूरा कर रहे हैं, और वह काम है पिछड़ों को भी हिन्दुत्व से जोड़कर उदारता से मारने का काम।

लेखक : कॅंवल भारती

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