Dalit Muslim

बहुजन समाज के तीन कप्तान, दलित पिछड़ा और मुसलमान

By Ritu Bhiva July 31, 2022 05:52 0 comments

हमारी विचाराधारा एक है, तो हमारी पार्टी भी एक ही है। इसलिए हमारे सर्वमान्य नेता के सन्दर्भ में कोई संशय नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दल के प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव होना सामान्य बात है। परंतु आज हमारा "बहुजन समाज" रूपी  "बुनियाद" जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है, ये सबसे ज्यादा चिंता का विषय है।  बहुजन समाज के लोग, सबसे ज्यादा सामाजिक और राजनीतिक रुप से चेतना संपन्न लोग हैं, बावजूद इसके सबसे ज्यादा बिखराव आज बहुजन समाज में ही व्याप्त है।

आज एक तरह का आक्रोश मैं बहुजन समाज के युवाओं में पनपते हुए देख पा रही हूं, कि राजनीतिक पार्टियों का रवैया ही समाज के बिखराव का एकमात्र कारण है, परंतु मैं इस बात से कतई सहमत नहीं हूं। हम सभी जानते हैं, कि "हमारा बिखराव" ही हमारी इस दुर्गति का सबसे बड़ा कारण है।

सर्वविदित है कि एक मजबूत और संगठित समाज ही राजनीति की दिशा और दशा तय करता है। साथियों बिना संगठित हुए हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते, एक प्लेटफॉर्म पर आने के अलावा और कोई भी विकल्प हमारे पास नहीं बचा है, इसलिए हमें कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी।

आज बहुजन समाज में सैकड़ों संगठन और हजारों नेता हैं, जो समाज के लिए काम कर रहे हैं, परंतु विखंडित होकर। अभी हमे किसी के भी ऊपर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं  खड़ा करना है, बल्कि सबको एकसाथ, एक प्लेटफॉर्म पर लाकर  "संगठित" तरीके से एक नई शुरूआत करने को प्रयासरत होना है।

इस कड़ी में हमारे पास कुछ ही विकल्प हैं:
1.  जो संगठन अस्तित्व में हैं, उसी में से किसी संगठन के बैनर तले समाज को एकजुट करने का प्रयास किया जाए।
2.  या आप सभी मिलकर एक "नया" अखिल भारतीय स्तर पर "लोकतांत्रिक और सामाजिक संगठन" का निर्माण करें।
मेरा सिर्फ एक ही उद्देश्य है,अगर पार्टी एक है, तो सामाजिक संगठन भी एक ही होना चाहिए।

यदि पार्टी की संख्या हजार भी हो जाय, तब भी हमारा सामाजिक संगठन एक ही रहे, तभी जाकर हम एक सशक्त समाज का निर्माण कर पाएंगे, तभी हम सत्ता के ऊपर दबाव समूह के रुप में अपनी बात मनवाने में सफल हों पाएंगे। इसलिए ये प्रश्न मैं आप लोगों के समक्ष  विचार और सुझाव करने को छोड़ रही हूं?

जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार है, यदि हम किसी पुराने संगठन के बैनर तले काम करने की बात करेंगे, तो संगठन को चुनने को लेकर, उसके नेतृत्व को लेकर कोई न कोई विवाद जरूर उत्पन्न होगा, किसी न किसी की सत्ता को ठेस पहुंचेगी ही।

इसलिए आप लोगों से अपील भी है की, जब एक नई शुरूआत करनी ही है, तो क्यों न निर्विवादित और नए तरीके से शुरुआत किया जाए। और आप सभी "व्यक्तिगत और क्षेत्रीय संगठनों" को खत्म करके/विलय करते हुए,  समाज हित में "अखिल भारतीय स्तर" पर एक नया और "लोकतांत्रिक चरित्र" वाला संगठन समाज को दें। ताकि हम सभी को एक साझा और बराबर का प्लैटफॉर्म मिले, जिसके नेता और कार्यकर्ता हम सभी लोग हों, और जहां अपने-अपने क्षमतानुसार अपने काम  का प्रदर्शन कर सकें, ताकि भविष्य में हम आने वाली पीढ़ियों के लिए, अपने नौनिहालों के लिए, उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए "लोकतांत्रिक संगठन" के रूप में उन्हें एक विरासत सौंप सकें।

लेखक : डॉ. इन्दु चौधरी

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